Friday, January 16, 2015

गाण्ड मेरी पटाखा बहन बानू की

प्रेषक : नामालूम
सम्पादक : जूजा जी
हैलो दोस्तो.. जैसे ही मैं घर में दाखिल हुआ तो घर पर कोई नज़र नहीं आया…काफी खामोशी थी।
मुझे अज़ीब सा महसूस हुआ…
फिर मुझे रसोई से कुछ आवाज़ आई।
जब मैं रसोई में घुसा.. तो वहाँ मेरी छोटी सौतेली बहन खड़ी होकर खाना बना रही थी।
उन दिनों गर्मियों के दिन थे और उसके कपड़े पसीने से गीले हो गए थे… जो कि उसके मादक जिस्म के साथ चिपके हुए थे।
मैं पीछे से उसके पास जाकर खड़ा हो गया और उसको पीछे से अपनी बाँहों में ले लिया।
मेरा लंड उसके सेक्सी और नरम-नरम गाण्ड के बीच में फँस कर दब गया।
‘ऊओह.. भाईजान… क्या करते हो… तुमने तो मुझे डरा ही दिया…’
वो मेरी तरफ मुड़ कर बोली।
मगर मैं उससे यूँ ही लिपटा रहा और वो दुबारा खाना पकाने लगी।
मेरे हाथ उसके सीने की ऊँची-नीची जगहों पर रेंगने लगे और मैंने उसकी गर्दन पर हल्का सा चुम्बन किया।
‘बानू… घर के और सब लोग कहाँ हैं? इतनी खामोशी क्यों है.?’
बानू ने खाना पकाते हुए कहा- वो तो लाहौर गए हैं.. नानू के पास… खाला की तबियत बहुत खराब हो गई है… कल रात को वापिस आयेंगे।
यह सुनते ही मेरे हरामी दिमाग में फिल्म चलने लगी।
मैं और बानू मेरी प्यारी बहन अकेले घर में पूरा दिन… पूरी रात… उफ्फ़!!!
मेरे मुँह से निकला, ‘हाय तेरी मेरी स्टोरी..’
उसने मेरी तरफ प्रश्नवाचक निगाहों से देखा।
‘बानू जानू… तेरी मेरी स्टोरी का मतलब है.. मैं और तुम अकेले…पूरे घर में… जो मर्ज़ी करें…उम्म्म्ममाअहह…’
मैंने उसके होंठों पर एक लंबी सी चुम्मी ली और उसको अपनी तरफ घुमाते हुए अपनी बाँहों में ले लिया।
अब उसके नरम-नरम मम्मे मेरे सीने के साथ दबने लगे और मेरा ठरकी लंड सीधा उसके पेट पर लग रहा था क्योंकि वो कद में मुझसे छोटी थी।
‘भाईजान.. क्या है…अभी तो खाना बनाने दो ना.. तुम तो बस हर वक्त ही तैयार रहते हो…मैं अब तुम्हारी ही हूँ.. सारा दिन… सारी रात…जो मर्जी कर लेना.. जितना खेलना हो.. मेरे साथ खेल लेना..’
और वो पीछे होने की कोशिश करने लगी।
‘नहीं जानू.. ऐसे तो नहीं…अब तो मैं सारे अरमान पूरे करूँगा… आज तो रसोई में ही स्टोरी16 गर्मी में… तेरे इन पसीने से गीले कपड़ों के साथ ही.. तेरे साथ खेलूँगा…’
और मैंने दोबारा उसको अपनी मज़बूत बाँहों में ले लिया।
मैं एक हाथ से उसकी नरम-नरम गाण्ड दबाने लगा… और उसको दुबारा चुम्बन किया।
‘उम्म्म्म…’
मगर वो फिर खुद को छुड़ाने लगी।
‘भाईजान.. अच्छा चूल्हा तो बंद कर लूँ.. वरना आज भूखा ही सोना पड़ेगा…’
उसके यह कहते ही मैंने एक हाथ से चूल्हा बंद कर दिया और मेरी प्यारी बहना बानू खुद ही मुझसे लिपट गई।
वो मेरे होंठों से फ्रेंच-किस करने लगी।
मेरा एक हाथ उसकी गाण्ड दबा रहा था और दूसरा हाथ उसकी कमीज़ के अन्दर घुस गया और उस के छोटे-छोटे नरम-नरम मम्मों से खेलने लगा।
बानू के मुँह से अब आवाजें निकलने लगी- उम्म्म्म… ऊउउन्ण…
फिर हमारी चूमा-चाटी खत्म हुई।
‘भाईजान…इतनी गर्मी है… यह शर्ट तो उतार दो अपनी…’ और यह कहते ही बानू ने मेरी शर्ट उतार दी।
‘बानू जान…खुद भी इतनी गर्मी में खड़ी हो… तू भी अपनी यह कमीज़ को उतार कर फेंक दे ना… अब तो घर पर कोई नहीं है…अब हम नंगे ही रहेंगे सारा दिन… सारी रात…’
‘तेरी मेरी स्टोरी’ के ख़याल से मेरा लंड डंडे की तरह अकड़ गया था कि अब पूरी रात… पूरा दिन मेरी छोटी बहन बानू मेरी आँखों के सामने नंगी फिरेगी… उसकी नंगी उठी हुई गाण्ड… तने हुए मम्मे.. मेरी आँखों के सामने हर वक्त रहेंगे।
फिर मैंने बानू की कमीज़ उतारी.. तो वो बोली- भाईजान… मेरा तो खुद बड़ा दिल करता था कि घर में बगैर कपड़ों के ही फिरूँ… शुक्र है अम्मी-अब्बा गए हैं.. अब तो मैं अपनी यह इच्छा भी पूरी कर लूँगी..
अब बानू मेरे सामने सिर्फ़ एक काले रंग की चिंदी सी ब्रा में खड़ी थी और उसने नीचे से सलवार पहनी हुई थी।
मैंने फ़ौरन उसके मम्मों पर हाथ डाला और दोनों हाथों से उसके मम्मे दबाने लगा… नींबू की तरह निचोड़ने लगा।
बानू की तो जैसे जान ही निकल गई और उस ने मुँह ऊपर को कर लिया और कामुक आवाजें निकालने लगी।
‘आअहह… भाईजानआ… उफफ्फ़…आराअम से खेलो ओहह.. .. तुम्हारे ही हैं यह…आअहह…’
वो तो मज़े से सराबोर हो गई थी…
फिर मैंने उसको दुबारा चुम्मी की…
एक हाथ से उसके मम्मे दबाने लगा और दूसरे हाथ से उसकी सलवार का नाड़ा खोल दिया और सलवार को खोल कर नीचे सरका दिया…
जब मेरा हाथ उस की टाँगों के बीच में गया तो मेरी खुशी की इन्तेहा नहीं रही…
क्योंकि बानू ने नीचे कुछ भी नहीं पहना हुआ था और उसकी फुद्दी पर थोड़े-थोड़े बाल आ चुके थे।
मैं ज़रा पीछे हटा… ताकि उसकी चिकनी और टाइट फुद्दी का नज़ारा कर सकूँ।
वाहह… क्या छोटी सी… फुद्दी थी मेरी प्यारी बहना की..
बानू ने भी अपनी टांगें खोल लीं और डीपफ़्रीज़र के साथ सट कर खड़ी हो गई…और बोली- भाईजान आज जितना खेलना है खेल लो.. ‘तेरी मेरी स्टोरी’ के साथ… आज की रात तो यह सिर्फ़ तुम्हारी है… जो करना ही कर लो… बस मुझे इतना प्यार करो… कि ये वक्त कभी भुला ना सकूँ.. अपने प्यारे भाईजान को।
वो मेरी बाँहों पर हाथ फेर रही थी… मैं नीचे बैठ गया… और एक हाथ से उसकी फुद्दी के होंठों खोले और एक ऊँगली बीच में फेरी…
तो उसने अपनी टांगें अकड़ा लीं… जैसे उसको करेंट लग गया हो।
फिर मैं उसकी चूत के ज़रा और करीब हुआ और अपने अंगूठे से उसकी फुद्दी रगड़ने लगा।
बानू के मुँह से ‘सी..उए.. सीई.. आआआह..’ की आवाजें निकल रही थीं।
मैं तो तजुर्बेदार बंदा था… मुझे मालूम था कि यहीं से तो हर लड़की को काबू किया जाता है।
फिर मैंने उसको एक चुम्बन किया उसकी फुद्दी पर… और बिल्कुल उसकी फुद्दी के होंठों के बीच में हल्का-हल्का चाटने लगा।
मेरा दूसरा हाथ उसकी एक ऊँगली उसकी गाण्ड में घुसने की कोशिश कर रही थी।
अब मैं उस की टाँगों के बिल्कुल बीच में बैठा और बड़े मज़े से चूत चाटने लगा।
बानू कसमसा रही थी… मैंने उसकी टाँगों के इर्द-गिर्द अपने मज़बूत हाथों का घेरा डाला हुआ था.. जो पीछे से होते हुए उसकी गाण्ड पर कसावट डाल रहे थे।
वो बिल्कुल फंसी हुई थी और मज़े से पागल हो रही थी।
‘उफ़फ्फ़.. भाईजानअ…बस..बस… भाईजानआ… आअहह…मैं छूटने वाली हूँ…आआहह ..ह .. में मर गई…आआहह…’
और एकदम उसकी चूत छूट गई… और वो ठंडी पड़ गई।
वो मेरी तरफ प्यार से देखते हुए मेरा मुँह अपने हाथों में लेते हुए बोली- भाईजान… तुम दुनिया के सब से अच्छे भाईजान हो…जो मुझे ज़िंदगी के इतने मज़े देते हो तेरी मेरी स्टोरी के… जिसकी तमन्ना दुनिया की आधी लड़कियाँ सिर्फ़ ख्वाब ही देखती हैं…
मैं खड़ा हुआ और बोला- बानू.. मेरी प्यारी बहना… अब मेरा नम्बर?
मैं मुस्कराते हुए उसको देखने लगा…
तो वो मुझसे लिपट गई और बोली- भाईजान… मैं तो खुद तुम्हारी हो गई हूँ…पूरी की पूरी तेरी मेरी स्टोरी…
मैं उसको पीछे हटाते हुए बोला- बानू तेरी फुद्दी तो मैं रात को लूँगा… अभी तो मुझे तेरी गाण्ड का मज़ा लेना है… आज बड़ा दिल कर रहा है तेरी छोटी सी नरम-नरम गाण्ड में अपना लंबा लंड डालने का…
मैं उसकी गाण्ड को दबाता हुआ बोला।
वो मुझसे अलग होते हुए बोली- नहीं भाईजान… गाण्ड नहीं…मैंने आज तक गाण्ड में कुछ नहीं डाला है… अभी जब तुम अपनी ऊँगली डालने की कोशिश कर रहे थे… तो बहुत दर्द हो रहा था… तुम्हारा इतना मोटा लंबा लौड़ा कैसे जाएगा?
मैंने उसको दुबारा कमर से पकड़ कर अपने करीब किया और उसके होंठों पर एक चुम्बन किया और बोला- बानू… गाण्ड तो मैं तेरी ज़रूर मारूँगा.. मगर यकीन कर… एक बार थोड़ा सा दर्द बर्दाश्त कर ले अपने भाईजान के लिए…देख मैंने तेरे लिए क्या नहीं किया… बाकी सब मैं खुद संभाल लूँगा…
मैंने फ्रीज़र खोला और उसमें रखा हुआ मक्खन निकाल कर अपने हाथ पर लिया।
बानू नंगी खड़ी मुझे देख रही थी। मेरा लंड उस वक्त पूरा खड़ा था और कड़क डंडा सा हो गया था।
मैंने सारा मक्खन अपने लंड पर मल दिया…
अब मेरा लंड बहुत चिकना सा हो गया।
फिर मैंने बानू को चूमा और उसको घुमा दिया।
बानू परेशान-परेशान सी दिख रही थी- भाईजान… प्लीज़… देखो… मैं तुम्हारी बात मान रही हूँ… मगर आराम से करना.. मुझे दर्द नहीं होना चाहिए…
मैंने उसके दोनों हाथ डीप-फ़्रीज़र पर रखे.. और वो झुकी सी कुतिया जैसी बन चुकी थी उसकी गाण्ड बाहर को निकली हुई थी, जो मक्खन मेरे हाथ में बचा था.. उसे मैंने उसकी गाण्ड के छेद पर मला और बोला- बानू…बस तू फिकर ना कर.. तू मेरी इतनी प्यारी बहना है…मैं तुझे कोई तकलीफ़ कैसे दे सकता हूँ… मैं तो सिर्फ़ तुझे मजे ही देता हूँ ना…आज के बाद देख लेना तू खुद कहेगी…कि मेरी गाण्ड मारो…
मैंने अपने लंड का सुपारा उसकी छोटी सी गाण्ड की मोरी पर रखा और ज़ोर लगाया…
लंड और बानू की गाण्ड चिकनी होने की वजह से… टोपा तो आराम से अन्दर चला गया।
अब मैं दोनों हाथ आगे बढ़ा कर बानू के झूलते कबूतर पकड़े और ज़ोर लगा कर अपना लंड बानू की गाण्ड के अन्दर ठेलने लगा।
चिकनाहट की वजह से लंड आराम-आराम से अन्दर जा रहा था।
बानू आगे को हो रही थी… ताकि लंड उसकी गाण्ड में ना घुसे…
मगर मैंने उसके मम्मों से उसको अपने लौड़े की तरफ खींचा और एक तगड़ा झटका दिया।
मेरा पूरा लंड अन्दर घुस गया… मैं उसके साथ पीछे से लिपट गया।
बानू की चीख निकल गई- भाईजानआअ… आआहह… बसस्स… बसस्स .. प्लीज़… रुक जाओ… मेरी गाण्ड फट रही है… प्लीज़ भाईजान…
मैं बानू को चुम्बन करने लगा… गर्दन पर… कमर पर…
और एक हाथ से उसके मम्मे भी दबा रहा था और दूसरे हाथ को उसकी फुद्दी पर ले गया… और रगड़ने लगा।
अब मैं आराम-आराम से अन्दर-बाहर करने लगा।
‘बानू बस… अब तो सब खत्म हो गया…अब तो तू मज़े में झूला झूलेगी…’
थोड़ी देर के बाद… बानू अपनी गाण्ड की चुदाई का आनन्द लेने लगी…
मैं आराम-आराम से धक्के मार रहा था और बानू मेरे आगे अपनी गाण्ड को बड़े प्यार से घुमा रही थी।
‘उफफफ्फ़… जानू…आआहह…’
अब मैं छूटने लगा था… उसकी गाण्ड बहुत कसी हुई थी।
‘आहह…बानूउऊ…मेरी बहना… उफफफफफ्फ़… तेरी मस्त गाण्ड…आअहह…’
एकदम से मैं उसकी गाण्ड के अन्दर ही छूट गया और अपना लंड बाहर निकाल लिया।
बानू फ़ौरन वापिस घूमी और अपने घुटनों पर बैठ कर मेरा लण्ड चूसने लगी और माल की एक-एक बूँद साफ कर ली।
‘भाईजान… वाकयी…गाण्ड की चुदाई को तो बहुत मस्त है… मैं तो ऐसे ही डर रही थी…’
मैं अपनी 18 साल की सौतेली बहन के मासूम चेहरे को देख रहा था.. जो मेरा लण्ड किसी लॉलीपॉप की तरह चूस रही थी।
उफ़…कितनी मादक है मेरी बहन… मैं उसके मम्मे दबाने लगा।
वो खड़ी हुई और मुझसे लिपट गई… मेरा लण्ड उसके पेट के साथ छुआ तो…उसको दुबारा ठरक चढ़ गई।
मैंने उसको एक चुम्मी की- उम्म्माआहह… बानू अब तो खाना पका…मैं ज़रा शावर ले कर आता हूँ… बाकी काम खाने के बाद…
मैं बाथरूम में चला गया.. मैंने फुव्वारा खोला और अभी ठंडा पानी मेरे ऊपर गिरना शुरू ही हुआ था कि किसी ने मुझे पीछे से अपनी बाँहों में ले लिया…
मैंने देखा तो बानू भी वहाँ नंगी खड़ी थी… मेरी प्यारी चुदक्कड़ बहन… उस के छोटे-छोट अमरुद…उसकी तंग सी फुद्दी… कन्धों तक बाल…उफ़फ्फ़… कितनी कामुक लग रही थी वो…
‘भाईजान… खाना तो बाद में ही बना लूँगी… मगर आपके साथ नहाने का मौका रोज़-रोज़ नहीं मिलता…’
वो मुस्कराते हुए इतनी क्यूट लग रही थी… कि मेरा लंड दुबारा खड़ा होने लगा।
मुझे आप अपने विचार यहाँ मेल करें।
zooza.ji@yahoo.comप्रेषक : नामालूम
सम्पादक : जूजा जी
हैलो दोस्तो.. जैसे ही मैं घर में दाखिल हुआ तो घर पर कोई नज़र नहीं आया…काफी खामोशी थी।
मुझे अज़ीब सा महसूस हुआ…
फिर मुझे रसोई से कुछ आवाज़ आई।
जब मैं रसोई में घुसा.. तो वहाँ मेरी छोटी सौतेली बहन खड़ी होकर खाना बना रही थी।
उन दिनों गर्मियों के दिन थे और उसके कपड़े पसीने से गीले हो गए थे… जो कि उसके मादक जिस्म के साथ चिपके हुए थे।
मैं पीछे से उसके पास जाकर खड़ा हो गया और उसको पीछे से अपनी बाँहों में ले लिया।
मेरा लंड उसके सेक्सी और नरम-नरम गाण्ड के बीच में फँस कर दब गया।
‘ऊओह.. भाईजान… क्या करते हो… तुमने तो मुझे डरा ही दिया…’
वो मेरी तरफ मुड़ कर बोली।
मगर मैं उससे यूँ ही लिपटा रहा और वो दुबारा खाना पकाने लगी।
मेरे हाथ उसके सीने की ऊँची-नीची जगहों पर रेंगने लगे और मैंने उसकी गर्दन पर हल्का सा चुम्बन किया।
‘बानू… घर के और सब लोग कहाँ हैं? इतनी खामोशी क्यों है.?’
बानू ने खाना पकाते हुए कहा- वो तो लाहौर गए हैं.. नानू के पास… खाला की तबियत बहुत खराब हो गई है… कल रात को वापिस आयेंगे।
यह सुनते ही मेरे हरामी दिमाग में फिल्म चलने लगी।
मैं और बानू मेरी प्यारी बहन अकेले घर में पूरा दिन… पूरी रात… उफ्फ़!!!
मेरे मुँह से निकला, ‘हाय तेरी मेरी स्टोरी..’
उसने मेरी तरफ प्रश्नवाचक निगाहों से देखा।
‘बानू जानू… तेरी मेरी स्टोरी का मतलब है.. मैं और तुम अकेले…पूरे घर में… जो मर्ज़ी करें…उम्म्म्ममाअहह…’
मैंने उसके होंठों पर एक लंबी सी चुम्मी ली और उसको अपनी तरफ घुमाते हुए अपनी बाँहों में ले लिया।
अब उसके नरम-नरम मम्मे मेरे सीने के साथ दबने लगे और मेरा ठरकी लंड सीधा उसके पेट पर लग रहा था क्योंकि वो कद में मुझसे छोटी थी।
‘भाईजान.. क्या है…अभी तो खाना बनाने दो ना.. तुम तो बस हर वक्त ही तैयार रहते हो…मैं अब तुम्हारी ही हूँ.. सारा दिन… सारी रात…जो मर्जी कर लेना.. जितना खेलना हो.. मेरे साथ खेल लेना..’
और वो पीछे होने की कोशिश करने लगी।
‘नहीं जानू.. ऐसे तो नहीं…अब तो मैं सारे अरमान पूरे करूँगा… आज तो रसोई में ही स्टोरी16 गर्मी में… तेरे इन पसीने से गीले कपड़ों के साथ ही.. तेरे साथ खेलूँगा…’
और मैंने दोबारा उसको अपनी मज़बूत बाँहों में ले लिया।
मैं एक हाथ से उसकी नरम-नरम गाण्ड दबाने लगा… और उसको दुबारा चुम्बन किया।
‘उम्म्म्म…’
मगर वो फिर खुद को छुड़ाने लगी।
‘भाईजान.. अच्छा चूल्हा तो बंद कर लूँ.. वरना आज भूखा ही सोना पड़ेगा…’
उसके यह कहते ही मैंने एक हाथ से चूल्हा बंद कर दिया और मेरी प्यारी बहना बानू खुद ही मुझसे लिपट गई।
वो मेरे होंठों से फ्रेंच-किस करने लगी।
मेरा एक हाथ उसकी गाण्ड दबा रहा था और दूसरा हाथ उसकी कमीज़ के अन्दर घुस गया और उस के छोटे-छोटे नरम-नरम मम्मों से खेलने लगा।
बानू के मुँह से अब आवाजें निकलने लगी- उम्म्म्म… ऊउउन्ण…
फिर हमारी चूमा-चाटी खत्म हुई।
‘भाईजान…इतनी गर्मी है… यह शर्ट तो उतार दो अपनी…’ और यह कहते ही बानू ने मेरी शर्ट उतार दी।
‘बानू जान…खुद भी इतनी गर्मी में खड़ी हो… तू भी अपनी यह कमीज़ को उतार कर फेंक दे ना… अब तो घर पर कोई नहीं है…अब हम नंगे ही रहेंगे सारा दिन… सारी रात…’
‘तेरी मेरी स्टोरी’ के ख़याल से मेरा लंड डंडे की तरह अकड़ गया था कि अब पूरी रात… पूरा दिन मेरी छोटी बहन बानू मेरी आँखों के सामने नंगी फिरेगी… उसकी नंगी उठी हुई गाण्ड… तने हुए मम्मे.. मेरी आँखों के सामने हर वक्त रहेंगे।
फिर मैंने बानू की कमीज़ उतारी.. तो वो बोली- भाईजान… मेरा तो खुद बड़ा दिल करता था कि घर में बगैर कपड़ों के ही फिरूँ… शुक्र है अम्मी-अब्बा गए हैं.. अब तो मैं अपनी यह इच्छा भी पूरी कर लूँगी..
अब बानू मेरे सामने सिर्फ़ एक काले रंग की चिंदी सी ब्रा में खड़ी थी और उसने नीचे से सलवार पहनी हुई थी।
मैंने फ़ौरन उसके मम्मों पर हाथ डाला और दोनों हाथों से उसके मम्मे दबाने लगा… नींबू की तरह निचोड़ने लगा।
बानू की तो जैसे जान ही निकल गई और उस ने मुँह ऊपर को कर लिया और कामुक आवाजें निकालने लगी।
‘आअहह… भाईजानआ… उफफ्फ़…आराअम से खेलो ओहह.. .. तुम्हारे ही हैं यह…आअहह…’
वो तो मज़े से सराबोर हो गई थी…
फिर मैंने उसको दुबारा चुम्मी की…
एक हाथ से उसके मम्मे दबाने लगा और दूसरे हाथ से उसकी सलवार का नाड़ा खोल दिया और सलवार को खोल कर नीचे सरका दिया…
जब मेरा हाथ उस की टाँगों के बीच में गया तो मेरी खुशी की इन्तेहा नहीं रही…
क्योंकि बानू ने नीचे कुछ भी नहीं पहना हुआ था और उसकी फुद्दी पर थोड़े-थोड़े बाल आ चुके थे।
मैं ज़रा पीछे हटा… ताकि उसकी चिकनी और टाइट फुद्दी का नज़ारा कर सकूँ।
वाहह… क्या छोटी सी… फुद्दी थी मेरी प्यारी बहना की..
बानू ने भी अपनी टांगें खोल लीं और डीपफ़्रीज़र के साथ सट कर खड़ी हो गई…और बोली- भाईजान आज जितना खेलना है खेल लो.. ‘तेरी मेरी स्टोरी’ के साथ… आज की रात तो यह सिर्फ़ तुम्हारी है… जो करना ही कर लो… बस मुझे इतना प्यार करो… कि ये वक्त कभी भुला ना सकूँ.. अपने प्यारे भाईजान को।
वो मेरी बाँहों पर हाथ फेर रही थी… मैं नीचे बैठ गया… और एक हाथ से उसकी फुद्दी के होंठों खोले और एक ऊँगली बीच में फेरी…
तो उसने अपनी टांगें अकड़ा लीं… जैसे उसको करेंट लग गया हो।
फिर मैं उसकी चूत के ज़रा और करीब हुआ और अपने अंगूठे से उसकी फुद्दी रगड़ने लगा।
बानू के मुँह से ‘सी..उए.. सीई.. आआआह..’ की आवाजें निकल रही थीं।
मैं तो तजुर्बेदार बंदा था… मुझे मालूम था कि यहीं से तो हर लड़की को काबू किया जाता है।
फिर मैंने उसको एक चुम्बन किया उसकी फुद्दी पर… और बिल्कुल उसकी फुद्दी के होंठों के बीच में हल्का-हल्का चाटने लगा।
मेरा दूसरा हाथ उसकी एक ऊँगली उसकी गाण्ड में घुसने की कोशिश कर रही थी।
अब मैं उस की टाँगों के बिल्कुल बीच में बैठा और बड़े मज़े से चूत चाटने लगा।
बानू कसमसा रही थी… मैंने उसकी टाँगों के इर्द-गिर्द अपने मज़बूत हाथों का घेरा डाला हुआ था.. जो पीछे से होते हुए उसकी गाण्ड पर कसावट डाल रहे थे।
वो बिल्कुल फंसी हुई थी और मज़े से पागल हो रही थी।
‘उफ़फ्फ़.. भाईजानअ…बस..बस… भाईजानआ… आअहह…मैं छूटने वाली हूँ…आआहह ..ह .. में मर गई…आआहह…’
और एकदम उसकी चूत छूट गई… और वो ठंडी पड़ गई।
वो मेरी तरफ प्यार से देखते हुए मेरा मुँह अपने हाथों में लेते हुए बोली- भाईजान… तुम दुनिया के सब से अच्छे भाईजान हो…जो मुझे ज़िंदगी के इतने मज़े देते हो तेरी मेरी स्टोरी के… जिसकी तमन्ना दुनिया की आधी लड़कियाँ सिर्फ़ ख्वाब ही देखती हैं…
मैं खड़ा हुआ और बोला- बानू.. मेरी प्यारी बहना… अब मेरा नम्बर?
मैं मुस्कराते हुए उसको देखने लगा…
तो वो मुझसे लिपट गई और बोली- भाईजान… मैं तो खुद तुम्हारी हो गई हूँ…पूरी की पूरी तेरी मेरी स्टोरी…
मैं उसको पीछे हटाते हुए बोला- बानू तेरी फुद्दी तो मैं रात को लूँगा… अभी तो मुझे तेरी गाण्ड का मज़ा लेना है… आज बड़ा दिल कर रहा है तेरी छोटी सी नरम-नरम गाण्ड में अपना लंबा लंड डालने का…
मैं उसकी गाण्ड को दबाता हुआ बोला।
वो मुझसे अलग होते हुए बोली- नहीं भाईजान… गाण्ड नहीं…मैंने आज तक गाण्ड में कुछ नहीं डाला है… अभी जब तुम अपनी ऊँगली डालने की कोशिश कर रहे थे… तो बहुत दर्द हो रहा था… तुम्हारा इतना मोटा लंबा लौड़ा कैसे जाएगा?
मैंने उसको दुबारा कमर से पकड़ कर अपने करीब किया और उसके होंठों पर एक चुम्बन किया और बोला- बानू… गाण्ड तो मैं तेरी ज़रूर मारूँगा.. मगर यकीन कर… एक बार थोड़ा सा दर्द बर्दाश्त कर ले अपने भाईजान के लिए…देख मैंने तेरे लिए क्या नहीं किया… बाकी सब मैं खुद संभाल लूँगा…
मैंने फ्रीज़र खोला और उसमें रखा हुआ मक्खन निकाल कर अपने हाथ पर लिया।
बानू नंगी खड़ी मुझे देख रही थी। मेरा लंड उस वक्त पूरा खड़ा था और कड़क डंडा सा हो गया था।
मैंने सारा मक्खन अपने लंड पर मल दिया…
अब मेरा लंड बहुत चिकना सा हो गया।
फिर मैंने बानू को चूमा और उसको घुमा दिया।
बानू परेशान-परेशान सी दिख रही थी- भाईजान… प्लीज़… देखो… मैं तुम्हारी बात मान रही हूँ… मगर आराम से करना.. मुझे दर्द नहीं होना चाहिए…
मैंने उसके दोनों हाथ डीप-फ़्रीज़र पर रखे.. और वो झुकी सी कुतिया जैसी बन चुकी थी उसकी गाण्ड बाहर को निकली हुई थी, जो मक्खन मेरे हाथ में बचा था.. उसे मैंने उसकी गाण्ड के छेद पर मला और बोला- बानू…बस तू फिकर ना कर.. तू मेरी इतनी प्यारी बहना है…मैं तुझे कोई तकलीफ़ कैसे दे सकता हूँ… मैं तो सिर्फ़ तुझे मजे ही देता हूँ ना…आज के बाद देख लेना तू खुद कहेगी…कि मेरी गाण्ड मारो…
मैंने अपने लंड का सुपारा उसकी छोटी सी गाण्ड की मोरी पर रखा और ज़ोर लगाया…
लंड और बानू की गाण्ड चिकनी होने की वजह से… टोपा तो आराम से अन्दर चला गया।
अब मैं दोनों हाथ आगे बढ़ा कर बानू के झूलते कबूतर पकड़े और ज़ोर लगा कर अपना लंड बानू की गाण्ड के अन्दर ठेलने लगा।
चिकनाहट की वजह से लंड आराम-आराम से अन्दर जा रहा था।
बानू आगे को हो रही थी… ताकि लंड उसकी गाण्ड में ना घुसे…
मगर मैंने उसके मम्मों से उसको अपने लौड़े की तरफ खींचा और एक तगड़ा झटका दिया।
मेरा पूरा लंड अन्दर घुस गया… मैं उसके साथ पीछे से लिपट गया।
बानू की चीख निकल गई- भाईजानआअ… आआहह… बसस्स… बसस्स .. प्लीज़… रुक जाओ… मेरी गाण्ड फट रही है… प्लीज़ भाईजान…
मैं बानू को चुम्बन करने लगा… गर्दन पर… कमर पर…
और एक हाथ से उसके मम्मे भी दबा रहा था और दूसरे हाथ को उसकी फुद्दी पर ले गया… और रगड़ने लगा।
अब मैं आराम-आराम से अन्दर-बाहर करने लगा।
‘बानू बस… अब तो सब खत्म हो गया…अब तो तू मज़े में झूला झूलेगी…’
थोड़ी देर के बाद… बानू अपनी गाण्ड की चुदाई का आनन्द लेने लगी…
मैं आराम-आराम से धक्के मार रहा था और बानू मेरे आगे अपनी गाण्ड को बड़े प्यार से घुमा रही थी।
‘उफफफ्फ़… जानू…आआहह…’
अब मैं छूटने लगा था… उसकी गाण्ड बहुत कसी हुई थी।
‘आहह…बानूउऊ…मेरी बहना… उफफफफफ्फ़… तेरी मस्त गाण्ड…आअहह…’
एकदम से मैं उसकी गाण्ड के अन्दर ही छूट गया और अपना लंड बाहर निकाल लिया।
बानू फ़ौरन वापिस घूमी और अपने घुटनों पर बैठ कर मेरा लण्ड चूसने लगी और माल की एक-एक बूँद साफ कर ली।
‘भाईजान… वाकयी…गाण्ड की चुदाई को तो बहुत मस्त है… मैं तो ऐसे ही डर रही थी…’
मैं अपनी 18 साल की सौतेली बहन के मासूम चेहरे को देख रहा था.. जो मेरा लण्ड किसी लॉलीपॉप की तरह चूस रही थी।
उफ़…कितनी मादक है मेरी बहन… मैं उसके मम्मे दबाने लगा।
वो खड़ी हुई और मुझसे लिपट गई… मेरा लण्ड उसके पेट के साथ छुआ तो…उसको दुबारा ठरक चढ़ गई।
मैंने उसको एक चुम्मी की- उम्म्माआहह… बानू अब तो खाना पका…मैं ज़रा शावर ले कर आता हूँ… बाकी काम खाने के बाद…
मैं बाथरूम में चला गया.. मैंने फुव्वारा खोला और अभी ठंडा पानी मेरे ऊपर गिरना शुरू ही हुआ था कि किसी ने मुझे पीछे से अपनी बाँहों में ले लिया…
मैंने देखा तो बानू भी वहाँ नंगी खड़ी थी… मेरी प्यारी चुदक्कड़ बहन… उस के छोटे-छोट अमरुद…उसकी तंग सी फुद्दी… कन्धों तक बाल…उफ़फ्फ़… कितनी कामुक लग रही थी वो…
‘भाईजान… खाना तो बाद में ही बना लूँगी… मगर आपके साथ नहाने का मौका रोज़-रोज़ नहीं मिलता…’
वो मुस्कराते हुए इतनी क्यूट लग रही थी… कि मेरा लंड दुबारा खड़ा होने लगा।
मुझे आप अपने विचार यहाँ मेल करें।
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और देखती रही

होली का दिन मेरे लिये शुभ दिन बन कर आया। उस दिन मेरे मन की एक बड़ी इच्छा पूरी हो गयी। अनिल मेरे दूर के रिश्ते में मेरा चाचा ही लगता था उन दिनों वो भी आया हुआ था। मुझे अनिल बहुत अच्छा लगता था। मुझे ऐसा लगता था कि हाय ! कभी मैं उसके साथ चुदाई करूं। पर ऐसा मौका कभी नही मिला। मै उस पर दिल से मरती थी। होली उसे हमारे साथ ही खेलना था। चाचा और चाची उसके आने से बहुत खुश थे। अनिल उम्र में मुझसे दो साल छोटा था। अनिल १९ साल का रहा होगा। शाम को होली जलने वाली थी…. चाचा ने होली के बाद की रस्में पूरी की और अपनी रात की शिफ़्ट में काम करने को चले गये….रात को अचानक मेरी नींद खुल गयी। मैने करवट ली और फिर से आंखे बन्द कर ली। मुझे लगा कि कोई बात कर रहा है। चाची के कमरे से आवाज आ रही थी। चाचा तो थे नहीं….फिर किस से बात हो रही थी। मेरी उत्सुकता बढ गयी। मै बिस्तर से उतरी और चाचा के कमरे के दरवाजे के छेद पर आंख लगा दी। सामने अनिल खड़ा था। मैने समय देखा रात के लगभग १२ बज रहे थे। इतनी रात को ….? अभी तक सोये नहीं थे। मैं स्टूल धीरे से दरवाजे के पास रख कर आराम से बैठ गई…. मुझे लगा कि आज तक तो चाचा चाची की चुदाई देखती थी …. शायद आज कुछ और नजारा दिख जाये….मैने बड़े आराम से छेद पर आंख लगा दी। अनिल पहले तो चाची से बात करता रहा…. फिर उसने चाची के ब्लाऊज़ पर ऊपर से ही हाथ फ़ेरा। चाची ने उसका हाथ पकड़ कर अपनी चूंचियों पर दबा दिया। मेरे शरीर पर चींटियां रेंगने लगी…. तो अनिल भी चाची के साथ मजे करता है…. चाची का नाम नीता है….। नीता ने अपना एक हाथ बढा कर उसका लन्ड पकड़ लिया …. उनका कार्यक्रम शुरु हो चुका था…. मेरी चूत भी गरम होने लगी…. मैने अपनी चूंचियां दबा ली…. और देखती रही…. न जाने कब मेरी उंगली मेरे चूत में घुस गयी…. और अन्दर बाहर होने लगी…. अनिल चाची को खूब मजे से चोद रहा था। चाची अपना होली का त्योहार बड़े आनन्द से मना रही थी…. कभी में अपने बोबे भींचती कभी चूत को उंगली से चोदती…….. मेरे मुख से भी कभी कभी आह निकल जाती…. सिसकारियां फ़ूट पड़ती…. अचानक में झड़ गयी…. मैने अपनी चूत दबा ली…. और आकर बिस्तर पर लेट गयी …. पर नींद कहां थी…. आवाज़ें अभी भी आ रही थी…. मैने फिर से उठ कर देखा तो अब गान्ड चुदाई हो रही थी…. मैं फिर तरावट में आने लगी …. मेरी फ़ुद्दी फिर फ़ुदक उठी…. हाय।…. मैने अपनी चूत को दबाया और मन कड़ा करके बिस्तर पर आ गई।कुछ ही देर में चाची के कमरे से आवाजें आनी बन्द हो गयी …. मैं सोने की कोशिश करने लगी…. सवेरे उठते ही देखा कि सभी सो रहे थे। अनिल भी अपने कमरे में सो रहा था। मैने जल्दी से चाय बनाई…. पहले अनिल को उठा कर चाय दी फिर चाची यानी नीता को चाय दी। नीता ने सुस्ताते हुये कहा,” नेहा इधर बैठ ……..तुझसे कुछ पूछना है….” “हाऽ…. आन्टी…. कहो….” “एक बहुत पर्सनल सवाल है …. अनिल के बारे में….” नीता ने कहा। मैं एकदम से सहम कर नीता को देखने लगी। “अनिल के बारे में…. हां …….. क्या ?” “अनिल तुम्हारे बारे में कल पूछ रहा था …. क्या तुम्हें वो अच्छा लगता है….” मैं एकदम से झेंप गई। “आन्टी …. हां अच्छा है …. पर ऐसा क्यू पूछा….” “कल तुम रात को हमें उस छेद से देख रही थी ना….।” नीता ने तिरछी नजर से मुझे मुसकरा कर पूछा…. “ना….नहीं तो…. वो….तो….” एकदम से सीधा वार हुआ। “हम दोनों को पता है……..तुम देख रही थी…. पर हमने तुम्हें देखने दिया ….” नीता ने मतलबी निगाहों से मुझे मुस्करा कर देखा।”आन्टी …. सोरी…. अब नहीं होगा….” “अनिल तुम्हारे साथ रात वाला काम करना चाहता है …. बोलो है इच्छा….” “आन्टी …. सच …. ” मैने शरमा कर नीता की गोदी में अपना मुहं छुपा लिया “पर आन्टी मुझे शरम आयेगी ना….” “जब दो दिल राज़ी तो वहां शरम का क्या काम…. फिर मैं हू ना….” सुबह सुबह होली खेलने के दिन मेरे लिये अनिल क पैगाम ले कर आया…. मैने नीता के गाल पर एक प्यार का चुम्मा ले लिया। नीता मुसकरा उठी…. ” नेहा…. बेस्ट ओफ़ लक ….” “हटो आन्टी…. आप बड़ी वो है….यानी अच्छी हैं….।” मैं खुशी से फ़ूली नहीं समा रही थी…. मैने तुरन्त कपड़े बदले और होली के लिये सफ़ेद ड्रेस पहन लिया। हल्का सा मेक अप किया और इठला कर अनिल के कमरे में गई….”चाय का कप?…. ” मैने अनिल से बड़ी अदा से कहा…. अनिल मुझे देखता ही रह गया ….उसने मुझे चाय का कप थमा दिया।मैने कहा,”आज तो होली है …. 8 बजे से हम तो होली खेलेंगे…. तैयार रहना….”मेरी सहेलियां और नीता के मिलने वाले आने लगे थे। मिठाईयां खाई और खिलाई जा रही थी। सभी रंग में रंगे थे। मैं आज कुछ ज्यादा ही खुश थी…. क्योंकि सुबह ही मुझे चुदाई का न्योता मिल गया था…. रह रह कर मैं अनिल के पास जा कर उसे रंग लगा रही थी। अनिल भी अब शरारत करने लगा था …. वो कभी मेरा हाथ पकड़ लेता…. कभी मेरी पीठ पर धीरे से हाथ मारता। मुझे सिरहन होने लगती थी।”नेहा…. एक काम करा दे…. ये सामान ऊपर वाले कमरे में ले चल….” नीता ने आवाज लगाई। मैं भाग कर अन्दर गई…. और सामान ले कर नीता के साथ ऊपर कमरे में आ गई।नीता ने पूछा,”अनिल के क्या हाल है……..?” “आन्टी…. बड़ी मस्ती कर रहा है….” “तेरी ऐसे करके…. चूंचियां दबाई कि नहीं….” नीता ने मेरी चूंची दबाते हुये कहा।इतने में अनिल वहां आ गया…. नीता ने अनिल को देखते ही कहा,”ले नेहा…. अनिल आ गया…. अब तू चुदेगी….” फिर मेरे कान में बोली “तबियत से चुदवा लेना …. इसका लन्ड सोलिड है….” मैं शरमा गयी….नीता ने अनिल को कहा,”आ गये तुम …. अब ये रही नेहा …….. अब होली के मजे करो …. मैं जा रही हूं…. दरवाजा अन्दर से बन्द कर लेना……..” “चाची……..मत जाओ ना …. मुझे शरम आयेगी……..”अनिल मुस्कराया…. और बोला -”अब चाची? …. मेरे साथ होली तो खेलो…. और नेहा….तुम बच कर कहां जाओगी”कहते हुये अनिल ने मेरे चेहरे पर गुलाल लगा दी …. उसके हाथ अचानक मेरी चूंचियों पर आ गये और मेरे कुरते में अन्दर हाथ डाल कर मेरे उभारों पर गुलाल मल दिया साथ में मेरे उभारों को भी मसल डाला…. नीता ने देखा अनिल शुरु हो चुका है तो वो बाहर जाने लगी। इस हमले से मैं एकदम मस्त हो गयी। अनिल के मेरे उभारों को दबाने से मै उसे देखती रह गयी…. मुझे शरम आने लगी पर साथ ही मैने अपने उभारों को और आगे उभार दिया…. उसे चूंचियां मसलने का पूरा मौका दिया। अनिल ने मेरे बोबे हाथों में भर लिये। मैं सिसक उठी।”सिर्फ़ तेरे बोबे ही तो मचका रहा है….अभी तो देखती जा….” नीता ने कमरे को बन्द कर दिया। अनिल ने अन्दर से दरवाजा बन्द कर दिया। मैं सिमट कर खड़ी हो गयी। अनिल ने मुझे अपनी तरफ़ खींच लिया और अपनी बाहों में भर लिया । उसके लन्ड का कड़ापन मुझे चूत के आसपास चुभने लगा था।मैने जानकर कहा,”मेरे पीछे मत दबाना…. गुदगुदी होती है….””अच्छा …. कहां पर …. यहां चूतड़ों पर ….” और उसने मेरे दोनो गोल गोल चूतड़ मसल डाले। मै और शरमा कर सिमटने लगी।”जानती हो …. शरमाने वाली लड़की को चोदने से बड़ा आता है….””हाय….ऐसे नहीं बोलो ना ….”इधर अनिल ने अब मेरे कुर्ते को उतार दिया। मेरे दोनो उरोज तन कर सामने आ गये। फिर उसने मेरी सलवार का नाड़ा खोल कर उसे उतार दिया और मुझे बिल्कुल नंगी कर दिया। नंगी होने से मुझे शरम आने लगी मैं नीचे बैठ गयी।अनिल ने प्यार से मुझे उठाया और कहा,”नेहा…….. तुम्हारी जगह बिस्तर पर है…. उठो….”मैने जैसे ही नजर उठाई…. अनिल सामने नंगा खड़ा था। उसने कब खुद के कपड़े कब उतार लिये थे ये पता ही नहीं चला। मैने अपनी आंखे बन्द कर ली और अब मुझे होने वाली चुदाई नजर आने लग गयी थी। उसका लन्ड खड़ा हुआ था। मैने धीरे से उसका लन्ड पकड़ लिया। और उसकी चमड़ी ऊपर सरका दी…. उसका फूला हुआ लाल सुपाड़ा मेरे सामने था। मैने जीभ से उसे चाट लिया। अनिल कराह उठा। उसका लन्ड कड़क होता जा रहा था। मैने अब सुपाड़ा मुँह में भर लिया। और उसका लन्ड नीचे से पकड़ कर उसे ऊपर नीचे करने लगी। अनिल ने मेरे बोबे पकड़ लिये और उन्हे धीरे मसलने लगा। बोबे पर से लाल गुलाल अब हटने लगा था।उसने लन्ड मेरे मुंह से निकालते हुए अनिल ने कहा,” झुक जाओ…. घोड़ी बन जाओ…. देखो नेहा …. अब तुम चुदने वाली हो…. तैयार हो ना….””हाय रे…. नंगी तो हूं ना….अनिल…. ” मैने कहा और शरमा गयी….मैने बिस्तर पर अपने दोनो हाथ रख लिये और गान्ड पीछे उभार कर गान्ड की दोनों गोलाईयां उसके सामने कर दी। उसने अपना लन्ड हाथ से सहला कर मेरी गोलाईयों के बीच दरार में रख दिया। उसका लन्ड जैसे ही मेरी दरारों में लगा मुझे झुरझुरी आ गयी। अब उसका लन्ड सरक कर मेरी गान्ड के छेद पर आ टिका था। उसकी इच्छा गान्ड चोदने की थी ….मेरी गान्ड उसके लिये पूरी तरह से तैयार थी। उसके दोनों हाथ मेरी चूंचियों पर आ कर जम गये थे। कुछ ही क्षणों में उसने मेरी चूंचियां भींचते हुये लन्ड पर जोर मारा…. फ़क से उसका मोटा सुपाड़ा छेद में घुस पड़ा। मुझे हल्का सा दर्द हुआ। पर मोटे लन्ड का प्यारा सा अहसास हुआ। मेरी गान्ड में फंसा उसका लन्ड मुझे असीम आनन्द दे रहा था….तभी उसका एक जोरदार धक्का पड़ा…. मेरी चीख निकल गयी,”हायीईईऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ………… ओह्…. सोरी…. “”नेहा …. देखो ये कब से तुम्हारा दीवाना है….पूरा जाने दो अन्दर इसे ….।””हाय अनिल…….. हां जाने दो……..”मेरी गान्ड पर उसने अपना थूक टपका कर उसे और चिकना बना दिया।”हाय मेरे राजा….थूक लगा कर चोदोगे….?”अनिल हंस पड़ा…. और उसका लन्ड मेरी गान्ड में अन्दर बाहर सरकने लगा। मेरे सारे शरीर में उत्तेजना की लहर दौड़ पड़ी। मुझे उसके लन्ड का अन्दर बाहर जाना और रगड़ का अह्सास मस्त किये दे रहा था। “हाय अनिल…….. ये तुम्हारा लन्ड कितना प्यारा है…. कैसा सरक रहा है….”अनिल को ये सुनते ही और मस्त हो गया और मुझे अच्छा लग रहा है ये जानकर और भी जोश में आ गया। उसका लन्ड मेरी गान्ड में अब तेजी से उतरने लगा था। मेरी गान्ड चुद कर मस्त हो रही थी । मुझे हालांकि चुदाई जैसा तेज मजा तो नहीं आ रहा था….पर मैं अनिल को यही जता रही थी कि मैं आनन्द से पागल हुई जा रही हूँ।”हाय मेरे राजा चोद मेरी गान्ड को …….. पेल दे अपना लन्ड …. हाय क्या लन्ड है….”अनिल मेरे आनन्द को देख कर और ही मस्त हुआ जा रहा था। अब उसने मेरी गान्ड में से अपना लन्ड निकाल लिया…. मुझे लगा कि शायद ये झड़ने वाला होगा …. उसने अपने लन्ड को मेरी चूत पर मारा…. मेरा चिकना पानी चूत में भरा था। उसका गीला लन्ड मेरी चूत के बाहर फ़िसलने लगा फिर सरकता हुआ चूत में अन्दर बढ चला। अब सच में मेरी जान निकलने की बारी थी…. तीखी मिठास के साथ मेरे चूत में उसका लन्ड अन्दर जा रहा था …………ये था असली चुदाई का मजा। मै चिहुंक उठी। मुख से मीठी सी सिसकारी निकल पड़ी।”हाय रीऽऽऽऽऽ अनिल……..मेरी चुद गई रे…. हाय घुसा दे राम……..” “नेहाऽऽऽऽऽऽ…. तुम्हारी चूत मुझे मार डालेगी मुझे……..” अनिल भी कराहता हुआ बोला। उसके हाथ मेरी चूंचियो को मींज रहे थे। वो कभी मेरे चूंचक खींचता कभी जोर से मसक डालता। मै निहाल हो उठी थी। मेरी चूत में गजब की मिठास भरती जा रही थी…. मैं तेजी से सीमाएँ पार करने लगी…. लगभग मेरे मुँह से सीत्कारें निकलने लगी। “आये हाय रे….मेरे राजा …….. चोद दे रे…. मेरी चूत तो गयी आज…….. हाय मै चुद गयी….” “मेरी रानी …. तेरी चूत की मैं आज मां चोद दूंगा …. साली को फ़ाड़ दूंगा….” अनिल का धीरज भी छूटता जा रहा था। वो गालियों पर उतर आया था…. यानी अब सब कुछ उसके आपे से बाहर था…. “साली……..रंडी…. तेरी भोसड़ी मारूं …….. मेर लन्ड हाय रे….” “मेरे प्यारे अनिल।…….. हां हां ……..मेरी चूत का भोसड़ा बना दे…. लगा ….जोर से चोद्…. हाय राम्….” “हाय मेरी छिनाल…. तेरी बहन को….तेरी मां को…. रे…. आऽऽऽह्…. सबको चोदा मारू…. मेरी नेहा……..” उसकी मीठी मीठी गालियां सुन कर मेरी चूत में जोरदार मिठास भरने लगी…. मैं चरमसीमा पर पहुंचने लगी। उसकी नन्गी बातों ने मुझे झड़ने की ओर अग्रसर कर दिया। मैं अपने आप को रोकती रही….पर असफ़ल रही…….. मेरी चूत का पानी आखिर छूट ही पड़ा।”अनिल….आय राम ….मैं तो गई …. जरा जोर से झटके मार….” उसने मेरी चूंचियां और दबाई और झटके मारने लगा…. पर हाय रे….मै अब झड़ने लगी…. मैं अपनी चूंचियां उससे छुड़ाने लगी….मेरी चूत अब बार बार लहरें मार मार कर अपना रस छोड़ रही थी। मै अब पूरी झड़ चुकी थी। मैं अब बस और नही चुदना चह्ती थी। पर उसने और जोर लगा कर लन्ड मेरी चूत में दबा दिया,”आह नेहा…….. मैं गया…. आया…….. निकला रे….” मैंने अपनी चूत में से उसका लन्ड तुरंत निकाल लिया।”ओह्….नहीं….रूको….ऽभी नहीं….” पर मैने लन्ड निकाल कर उसे मुठ में ऐसा दबाया कि उसके लन्ड ने मेरे हाथ में अपना वीर्य छोड़ दिया। मैं उसके लन्ड को दूध निकालने जैसे खींच कर दुहने लगी…. उसके लन्ड से पिचकारी निकल कर मेरे हाथों को गीला कर रही थी….उसका सारा वीर्य उसके लन्ड पर मल दिया…. और अपने गीले हाथों में उसका वीर्य अपने होंठो से चाट लिया…. अनिल ने बड़े प्यार से मुझे देखा और अपने नंगे बदन से मेरा नंगा बदन चिपका लिया….हम कुछ पल ऐसे ही लिपटे खड़े रहे और प्यार करते रहे।फिर अनिल अलग हो गया और अपने कपड़े पहनने लगा। मैने भी जल्दी से कपड़े पहन लिये। अनिल ने ज्योंही दरवाजा खोला तो नीता सामने खड़ी थी ….”अरे नीता…. यहां कब से खड़ी हो….””अरे अनिल जी…. दिन को चुदाई कर रहे हो….बाहर पहरा दे रही थी….” मैं सर झुका कर चुपके से निकलने लगी।”नेहा…. चुदवा कर शरमा रही हो …. अब इस चुदाई की हमें मिठाई तो खिला दो….” नीता बड़ी बेशरमी से बोली।”रात को सब मिल कर खायें तो मजा आयेगा ना……..” नीता और अनिल दोनो हंस पड़े…. मैने शरमा कर अपने हाथों से अपना मुँह छुपा लिया…. नीता से प्यार से मुझे चूम लिया।